आलू दुनिया की सबसे ज्यादा उगाई जाने वाली सब्जी फसलों में से एक है, और भारत में यह लगभग हर रसोई का हिस्सा है। भारत चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा आलू उत्पादक देश है। उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार, गुजरात, पंजाब और मध्य प्रदेश जैसे राज्य आलू की खेती के मुख्य क्षेत्र हैं।

आलू में कार्बोहाइड्रेट, विटामिन C, विटामिन B6 और पोटैशियम अच्छी मात्रा में होता है। इसे सब्जी, पराठे, चिप्स, फ्रेंच फ्राइज़ और कई तरह के नमकीन व्यंजनों में इस्तेमाल किया जाता है। इसी माँग के कारण आलू की खेती किसानों के लिए नकदी का भरोसेमंद जरिया बनी हुई है।

लेकिन आलू की खेती में लागत ज्यादा लगती है, खासकर बीज पर, और फसल कई रोगों के प्रति संवेदनशील होती है। इसलिए सही किस्म, सही समय, संतुलित खाद, समय पर सिंचाई और रोगों की रोकथाम, इन पाँचों बातों पर ध्यान देना जरूरी है। इस लेख में आलू की खेती कैसे करें, इसकी पूरी जानकारी चरण-दर-चरण दी गई है।

आलू की उन्नत किस्में

भारत में आलू की ज्यादातर किस्में ICAR-केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (CPRI), शिमला ने विकसित की हैं, जिनके नाम “कुफरी” से शुरू होते हैं। नीचे कुछ प्रमुख किस्में दी गई हैं।

कुफरी ज्योति: मैदानी क्षेत्रों में सबसे ज्यादा प्रचलित किस्मों में से एक है। मध्यम अवधि की किस्म है और प्रति हेक्टेयर लगभग 250 से 300 क्विंटल उपज देती है।

कुफरी पुखराज: अगेती किस्म है, जो लगभग 70 से 90 दिन में तैयार हो जाती है। कंद बड़े, अंडाकार और सफेद होते हैं। प्रति हेक्टेयर लगभग 350 से 400 क्विंटल उपज मिलती है।

कुफरी बादशाह: लगभग 100 से 110 दिन में तैयार होने वाली किस्म है। उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है और झुलसा रोगों के प्रति इसकी सहनशीलता अच्छी मानी जाती है। प्रति हेक्टेयर लगभग 300 से 350 क्विंटल उपज मिलती है।

कुफरी चंद्रमुखी: लगभग 80 से 90 दिन में तैयार होती है। कंद बड़े, अंडाकार और सफेद होते हैं। औसत उपज प्रति हेक्टेयर लगभग 250 क्विंटल है।

कुफरी सिंदूरी: लाल छिलके वाली किस्म है, जो 110 से 120 दिन में तैयार होती है। यह तापमान और पानी की कमी को कुछ हद तक सह लेती है। औसत उपज प्रति हेक्टेयर लगभग 400 क्विंटल तक मानी जाती है।

कुफरी चिप्सोना-1 और कुफरी चिप्सोना-3: ये किस्में चिप्स और प्रसंस्करण उद्योग के लिए बनाई गई हैं। चिप्स बनाने वाली कंपनियों को आलू बेचने वाले किसान इन्हें चुन सकते हैं।

उपज मौसम, मिट्टी और प्रबंधन पर निर्भर करती है, और अलग-अलग स्रोतों में आँकड़े थोड़े अलग मिलते हैं। अपने क्षेत्र की सिफारिश के लिए नज़दीकी कृषि विज्ञान केंद्र से सलाह जरूर लें।

आलू की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु और मिट्टी

जलवायु: आलू ठंडे मौसम की फसल है। इसके लिए मध्यम ठंडा मौसम चाहिए। पौधों की बढ़वार के लिए लगभग 15 से 25 डिग्री सेल्सियस तापमान अच्छा रहता है। कंद बनने के समय रात का तापमान कम और दिन का तापमान मध्यम रहे तो कंद अच्छे बनते हैं। तापमान 30 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चला जाए तो कंद बनने की प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है और उपज घटती है। इसीलिए उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में आलू की खेती सर्दियों में की जाती है।

मिट्टी: आलू के लिए दोमट और बलुई दोमट मिट्टी सबसे अच्छी मानी जाती है, जिसमें जैविक पदार्थ भरपूर हो और पानी का निकास अच्छा हो। भारी चिकनी मिट्टी में कंद ठीक से नहीं फैल पाते और सड़ने का खतरा रहता है। मिट्टी का pH मान लगभग 5.5 से 6.5 के बीच अच्छा रहता है। बहुत क्षारीय मिट्टी में स्कैब रोग बढ़ने की संभावना रहती है।

खेत की तैयारी

आलू के कंद मिट्टी के अंदर बनते हैं, इसलिए मिट्टी का भुरभुरा होना बहुत जरूरी है।

  • खेत की गहरी जुताई लगभग 24 से 25 सेंटीमीटर गहराई तक करें और खेत को कुछ दिन धूप में खुला छोड़ दें। इससे मिट्टी में छिपे कीट और रोगों के बीजाणु कम होते हैं।
  • आखिरी जुताई के समय 25 से 30 टन प्रति हेक्टेयर (लगभग 10 से 12 टन प्रति एकड़) अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद मिट्टी में मिलाएँ।
  • इसके बाद 2 से 3 बार हल्की जुताई करके पाटा लगाएँ और खेत को समतल कर लें।
  • खेत में पानी का निकास अच्छा रखें, ताकि बारिश या सिंचाई का पानी जमा न हो।
  • बुवाई से पहले हल्की सिंचाई (पलेवा) करें और खेत में सही नमी आने पर, यानी लगभग 5 से 7 दिन बाद, बुवाई करें।

बीज और बीज की मात्रा

आलू की खेती में सबसे महँगा खर्च बीज का होता है, इसलिए बीज की गुणवत्ता पर समझौता न करें।

बीज का चुनाव: प्रमाणित और रोगमुक्त बीज कंद ही लें। कंद का वजन लगभग 40 से 50 ग्राम हो और उस पर 2 से 3 आँखें हों।

बीज की मात्रा: बीज की मात्रा कंद के आकार, दूरी और किस्म पर निर्भर करती है। सामान्य तौर पर 20 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर (लगभग 8 से 12 क्विंटल प्रति एकड़) बीज लगता है।

कंद काटकर बोने पर: बड़े कंद को काटना हो तो हर टुकड़े में कम से कम 2 आँखें रखें। कटे हुए टुकड़ों को छाया में सुखाकर ही बोएँ, ताकि वे मिट्टी में सड़ें नहीं।

बीज उपचार: बुवाई से पहले कंदों को उपचारित करना रोगों की शुरुआती रोकथाम में मदद करता है। अपनी फसल के लिए सही उपचार की जानकारी Izumi Biosciences की टीम से ली जा सकती है।

बुवाई का समय, दूरी और तरीका

बुवाई का समय: उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में मुख्य फसल की बुवाई अक्टूबर के पहले सप्ताह से नवंबर के मध्य तक की जाती है। अगेती किस्में जैसे कुफरी पुखराज जल्दी बोई जा सकती हैं, जबकि लंबी अवधि वाली किस्मों को समय पर बोना जरूरी है। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में रबी की फसल मध्य अक्टूबर से नवंबर के बीच बोई जाती है। पहाड़ी क्षेत्रों में बुवाई का समय अलग होता है, इसलिए स्थानीय सिफारिश देखें।

दूरी: कतार से कतार की दूरी 50 से 60 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 15 से 20 सेंटीमीटर रखें।

बीज की गहराई: कंदों को मेड़ के बीच में लगभग 5 से 7 सेंटीमीटर गहराई पर बोएँ और ऊपर से मिट्टी से ढक दें।

बुवाई का ढंग:

  • पहले 50 से 60 सेंटीमीटर की दूरी पर कूंड़ (नालियाँ) बनाएँ।
  • उर्वरक की आधारीय मात्रा कूंड़ में बीज से थोड़ा नीचे और अलग डालें, ताकि कंद सीधे खाद के संपर्क में न आएँ।
  • कंद रखकर मिट्टी चढ़ाकर मेड़ बना दें।

खरपतवार नियंत्रण और मिट्टी चढ़ाना

आलू का पौधा लगभग 4 सप्ताह में खेत को ढक लेता है। इसलिए पहले 4 सप्ताह में खरपतवार पर नियंत्रण जरूरी है, वरना वे खाद और पानी का बड़ा हिस्सा खींच लेते हैं।

  • बुवाई के लगभग 25 से 30 दिन बाद, जब पौधे 15 सेंटीमीटर के आसपास ऊँचे हों, निराई-गुड़ाई करें।
  • उसी समय पौधों पर मिट्टी चढ़ाएँ (अर्थिंग अप) और बची हुई नाइट्रोजन खाद डालें।
  • मिट्टी चढ़ाने से कंद ढके रहते हैं। खुले कंद धूप लगने से हरे हो जाते हैं और खाने लायक नहीं रहते।

आलू की खेती में खाद और उर्वरक

आलू भारी खुराक लेने वाली फसल है, इसलिए संतुलित पोषण जरूरी है।

खाद / पोषक तत्वमात्राकब डालें
सड़ी गोबर की खाद25 से 30 टन प्रति हेक्टेयर (10 से 12 टन प्रति एकड़)आखिरी जुताई के समय
नाइट्रोजनलगभग 150 किग्रा प्रति हेक्टेयर (लगभग 60 किग्रा प्रति एकड़, यानी करीब 130 किग्रा यूरिया)दो-तिहाई बुवाई के समय, बाकी मिट्टी चढ़ाते समय
फॉस्फोरस और पोटाशमिट्टी जाँच की रिपोर्ट के अनुसारपूरी मात्रा बुवाई के समय

खाद की सही मात्रा मिट्टी, किस्म और क्षेत्र पर निर्भर करती है। मिट्टी की जाँच कराकर ही फॉस्फोरस और पोटाश की मात्रा तय करें।

सिंचाई

आलू की जड़ें कम गहराई तक जाती हैं, इसलिए फसल को नियमित और हल्की सिंचाई चाहिए। सिंचाई का कार्यक्रम मौसम और मिट्टी के अनुसार बदलता है, पर सामान्य नियम ये हैं:

  • पहली सिंचाई: अंकुर निकलने के आसपास, यानी बुवाई के लगभग 10 से 12 दिन बाद हल्की सिंचाई करें।
  • आगे की सिंचाई: मिट्टी और मौसम के हिसाब से लगभग 8 से 12 दिन के अंतर पर सिंचाई करें।
  • कंद बनने का समय: बुवाई के लगभग 35 से 60 दिन बाद का समय सबसे जरूरी होता है। इस समय खेत में नमी बनाए रखें।
  • पानी की मात्रा: नालियों में पानी मेड़ की आधी से दो-तिहाई ऊँचाई तक ही भरें। मेड़ के ऊपर पानी न चढ़ने दें।
  • अनियमित सिंचाई से बचें: कभी बहुत सूखा और कभी बहुत पानी देने से कंदों में दरारें पड़ती हैं और उनका आकार बिगड़ता है।
  • खुदाई से पहले: खुदाई से 10 से 15 दिन पहले सिंचाई बंद कर दें, ताकि कंदों का छिलका मजबूत हो जाए।
  • कोहरा और पाला: पाले की आशंका हो तो हल्की सिंचाई करें, इससे पौधों को बचाव मिलता है।

आलू की खेती में लगने वाले रोग, कीट और नियंत्रण

नामजानकारीदवादवा की मात्रा
पछेती झुलसा (लेट ब्लाइट)पत्तियों पर भूरे-काले धब्बे, नमी में सफेद फफूंद की परत, तने और कंद तक फैलता हैIzumil और Izumonas3 ml – Izumil, 5 ml – Izumonas
अगेती झुलसा (अर्ली ब्लाइट)पुरानी पत्तियों पर गोल, छल्लेदार भूरे धब्बेIzumil और Izumonas3 ml – Izumil, 5 ml – Izumonas
काली रूसी (ब्लैक स्कर्फ)कंदों की सतह पर काली पपड़ी जैसे दाने, अंकुर कमजोरIzumil और Izumonas3 ml – Izumil, 5 ml – Izumonas
सामान्य स्कैबकंदों पर खुरदरे, खुरदुरे धब्बेIzumil और Izumonas3 ml – Izumil, 5 ml – Izumonas
जीवाणु मृदुगलन (सॉफ्ट रॉट)कंद सड़कर गीले और बदबूदार हो जाते हैंIzumil और Izumonas3 ml – Izumil, 5 ml – Izumonas
जीवाणु उकठा (बैक्टीरियल विल्ट)पौधे अचानक मुरझाकर सूख जाते हैंIzumil और Izumonas3 ml – Izumil, 5 ml – Izumonas
हरे कंदकंद धूप लगने से हरे पड़ जाते हैंमिट्टी चढ़ाकर कंद ढकेंदवा की जरूरत नहीं
कंदों में दरारेंअनियमित या ज्यादा सिंचाई से कंद फट जाते हैंनियमित और हल्की सिंचाई करेंदवा की जरूरत नहीं
माहू (एफिड)पत्तियों का रस चूसने वाले छोटे कीट, वायरस रोग भी फैलाते हैंIzumi Guard5 ml प्रति लीटर पानी
सूत्रकृमि (निमेटोड)मिट्टी में रहने वाले सूक्ष्म, धागे जैसे जीव, जड़ों को नुकसान पहुँचाते हैंIzumi Guard5 ml प्रति लीटर पानी

छिड़काव सुबह या शाम के समय करें और पैकेट पर लिखे निर्देश जरूर पढ़ें। रोग के लक्षण दिखते ही छिड़काव शुरू करने से नुकसान कम होता है। बादल और नमी वाले मौसम में झुलसा रोग तेजी से फैलता है, इसलिए ऐसे मौसम में खेत की निगरानी बढ़ा दें।

खुदाई और उपज

फसल कब तैयार होती है: किस्म के अनुसार आलू की फसल लगभग 70 से 120 दिन में तैयार हो जाती है। अगेती किस्में जल्दी और लंबी अवधि की किस्में देर से तैयार होती हैं।

खुदाई से पहले: पौधों की पत्तियाँ पीली पड़कर सूखने लगें तो फसल पकने की ओर होती है। खुदाई से 10 से 15 दिन पहले पौधों के ऊपरी हिस्से (बेल) को काट दें और सिंचाई बंद रखें। इससे कंदों का छिलका मजबूत होता है और भंडारण में कंद कम खराब होते हैं।

खुदाई का तरीका: खुदाई के समय कंदों को चोट न लगने दें। कटे या चोट खाए कंद जल्दी सड़ते हैं। खुदाई के बाद आलू को छाया में फैलाकर सुखाएँ और छाँटकर रखें।

उपज: अच्छी देखभाल में किस्म के अनुसार प्रति हेक्टेयर लगभग 250 से 400 क्विंटल तक उपज मिल सकती है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1. आलू की खेती के लिए सबसे अच्छा समय कौन सा है?

उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में अक्टूबर के पहले सप्ताह से नवंबर के मध्य तक का समय मुख्य फसल के लिए उपयुक्त माना जाता है। अपने क्षेत्र और किस्म के अनुसार स्थानीय सिफारिश देखें।

2. एक एकड़ में आलू का कितना बीज लगता है?

सामान्य तौर पर एक एकड़ में लगभग 8 से 12 क्विंटल बीज लगता है। यह मात्रा कंद के आकार, दूरी और किस्म पर निर्भर करती है।

3. आलू में मिट्टी कब चढ़ानी चाहिए?

बुवाई के लगभग 25 से 30 दिन बाद, जब पौधे 15 सेंटीमीटर के आसपास हों, तब निराई के साथ मिट्टी चढ़ानी चाहिए। इसी समय बची हुई नाइट्रोजन खाद भी डाली जाती है।

4. आलू में पछेती झुलसा रोग से कैसे बचें?

बादल और नमी वाले मौसम में खेत की रोज निगरानी करें, रोग प्रतिरोधी किस्म चुनें और लक्षण दिखते ही छिड़काव करें। खेत में पानी जमा न होने दें।

आलू की अच्छी फसल के लिए सही समय पर सही कदम

आलू की खेती में सफलता का आधार है: सही किस्म, रोगमुक्त बीज, संतुलित खाद, समय पर सिंचाई और रोगों की रोकथाम। इनमें से किसी एक में चूक होने पर पूरी फसल की उपज और मुनाफा घट सकता है।

Izumi Biosciences किसानों के लिए जैविक और विज्ञान-आधारित समाधान बनाती है, जो असली खेतों की स्थितियों में काम करते हैं।

आलू की फसल में रोग या कीट की समस्या आ रही है? Izumi Biosciences की टीम से संपर्क करें और अपनी फसल के लिए सही उत्पाद और मात्रा की सलाह लें।